भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार का रोग, भारत को छू रहा है,
न्याय की धारा को, लहू में बहा रहा है।
सच्चाई का द्वार, भ्रष्ट है बंद, अन्धकार में राज, न्याय की धरा खंड।
धन के लालच में, खोया इन्सानी भाव, व्यापार का मेला, धर्म का विस्तार।
रिश्तों की माया, खोखला है अर्थ, भ्रष्टाचार के बंधन में, लपेटा हर व्यक्ति कथ।
न्याय की प्रतीक्षा, करते हैं हम सभी, पर भ्रष्टाचार के गहरे समुंदर में, खो जाती है वह नदी।
संघर्ष जारी है, सत्य के लिए, भ्रष्टाचार के खिलाफ, हर ज़ुबान पर यही विरागत है।
समय आया है, सच का साथ देने का, भ्रष्टाचार के विरुद्ध, हमें आगे बढ़ने का।
न्याय की राह पर, सत्य की ओर, भ्रष्टाचार को हराने, हमें उत्साह बनाने का।
भारत के दिल में, इस रोग को खत्म करना है, न्याय की धारा को, फिर से जीना है।
सत्य के प्रतीक, हो बना भारत, भ्रष्टाचार को हराने, लड़ना है हमें साथ।
भ्रष्टाचार का अंत, हो जाए इस जग में, न्याय की धारा, स्वतंत्र फिर से हो जाए इस देश में।
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